उसका साथ

जो चलना पड़े उसके साथ,तो मुझे धूप में तपती अपने पाँव ही पसंद है। जो खाना पड़े उसके साथ,तो मुझे उसके साथ सूखी रोटी ही पसंद है। जो सोना पड़े उसके साथ,बिस्तर की जगह उसकी बाँहें ही पसंद हैं। और सुनो, तुम रखो न महल,मुझे उसके साथ बैराग ही पसंद है। — Writer Sakshi Parmar

कैसे समझाऊं तुम्हें by Rabiya Nizam

Kaise Samjhaun Tumhe

कैसे समझाऊं तुम्हें? कि ये चुप्पी चुभती है मुझे भय उत्पन्न करती है, उस पुराने खंडहर की तरह, जो सदियों से खड़ा, अमूक, नि: श्वास, नि: शब्द समाए अपने भीतर असंख्य हृदय की वेदना- गाथा ! कैसे समझाऊं तुम्हें? कि पल-पल  करती हूं मैं तुम्हारा इंतज़ार, रात की शीतलता से मुरझाए सूरजमुखी की तरह, कि … Read more