ज़िम्मेदारियों की ज़ंजीर
कभी दिल कहता है छोड़ दे ये नौकरी,साँस भरकर अपने सपनों की राह पकड़ ले।पर घर की दीवारें पूछ लेती हैं,“तेरे बिना चूल्हा कैसे जल पाएगा?”नौकरी छोड़ने का डर हर सुबह आँखों में उतर आता है,और हौसले का सूरज ढक सा जाता है।दिल चाहता है सच बोल दूँ, ग़लत को ग़लत कह दूँ,पर होंठों पर … Read more