कभी दिल कहता है छोड़ दे ये नौकरी,
साँस भरकर अपने सपनों की राह पकड़ ले।
पर घर की दीवारें पूछ लेती हैं,
“तेरे बिना चूल्हा कैसे जल पाएगा?”
नौकरी छोड़ने का डर हर सुबह आँखों में उतर आता है,
और हौसले का सूरज ढक सा जाता है।
दिल चाहता है सच बोल दूँ, ग़लत को ग़लत कह दूँ,
पर होंठों पर ताले लग जाते हैं,
क्योंकि डर है कि कल को तनख्वाह न आएगी।
हर मीटिंग में, हर आदेश में,
कभी अपने ही मन के खिलाफ़ खड़ा होना पड़ता है।
दिल चुपचाप चीखता है,
पर दिमाग कहता है – “सहन कर ले,
ये नौकरी ही घर का सहारा है।”
कभी सोचता हूँ, ज़िंदगी नौकरी की गुलामी से बड़ी है,
सपनों का भी एक हक़ है मुझ पर।
पर अगले ही पल बीवी-बच्चों की मुस्कान याद आती है,
और डर मुझे फिर से कुर्सी पर बैठा देता है।
ये नौकरी छोड़ने का डर भी अजीब कैद है,
सपनों को कैदी बना देता है।
मैं आज़ाद होना चाहता हूँ,
पर घर की ज़िम्मेदारियाँ जंजीर बन जाती हैं।
शायद एक दिन हिम्मत आएगी,
और मैं कह दूँगा – “बस, अब और नहीं।
”उस दिन डर हार जाएगा,
और मैं अपने सपनों का सफर शुरू कर दूँगा।
By Sakshi Parmar
