मेरे सपनों का भारत— माँ भारती के वीर सपूतों का योगदान

मेरे सपनों का भारत वो भारत है… जो अटक से लेकर कटक तककश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तकअखंड है, एक है। देश की आज़ादी का सपना वो सपना हैजिसकी ख़ातिर वीरों ने अपना बलिदान दिया शिवाजी ने शौर्य दिया औरप्रताप ने स्वाभिमान दियागाँधी ने असहयोग और अहिंसा दीनेहरू ने अपना ईमान दिया राजे रजवाड़ों में बंटे … Read more

प्रकृति खतरे में

कि जिस से जीने का स्रोत है कर देते हो उसी को नष्ट । जिसकी हवाएं कर देती है मन को पावन तुम देते हो उसी को कष्ट। प्रकृति अनमोल है समझो इसका मोल इससे ऊपर कुछ नहीं समझो मेरी ये बोल कि रुक जा थम जा संभल जाओ मत दो ये तकलीफ सोचो तो … Read more

प्रकृति के अनेकों रूप

अद्भुत सा रूप है, ईश्वर का स्वरूप है हमारे प्रकृति के अनेकों रूप है सावन की हरियाली है बादल भी मतवाली है, हमारी प्रकृति के पेड़ भी झूलों की डाली है अंबर का आंचल है धरती भी चादर है , हमारे प्रकृति के फलों में भी गागर है, आमो का मिठास है बबूल भी खास … Read more

प्रकृति है तो जीवन है

जिम्मेदार कौन है ईश प्रकृति के इस हनन का तमाशा कौन बना रहा जगमगाते इस चमन का। इंसानों ने दैत्य बनकर जो ये कुटिलता दिखाई है प्रकृति के गर्भ को उजाड़ बस हिंसा ही फैलाई है। पंछियों कि चहचहाहट भी अब गुप्त हो चुकी है मानवता भी अंधेरे के पिंजरे में लुप्त हो चुकी है। … Read more

शमा by Rabiya Nizam

शमा एक शाम और बीत गईएक दिन और निकल गयाबड़े गुरूर से उरुज पे था अफताब अहले सुबहफिर शाम की दस्तक पे वो भी ढल गया..कुछ रेत के मोजस्समें थेकुछ मलबे थे अरमान की मीनारों केअधूरे ख़्वाब भी चुभे थे दीद में कहींपर अंसुओं के रेलों में सब बिखर गयाआज फिर सजी महफिलउसके इद्दातों, इंतजार … Read more

चुनिंदा ज्ञान by आकांक्षा रायकवार

जिंदगी के लिए एक ख़ास सलीका रखना, अपनी उम्मीद को हर हाल में जिंदा रखना, किया है दूसरों के अंधेरे में उजाला हमने, अभी खुद के अंधेरे को दूर करना, सीखना दूसरो को वाकई मन से, लेकिन अपने मन को भी सीख से भरपूर रखना, हिम्मत, लगन और सहनशील बनकर, सबके दुखों को दूर करना, … Read more

आज़ादी by Nandlal Ahi (Aazadi Amrit Mahotsav- 75th Independence Day)

खून की होली तुमने बहुत खेल ली , आ गयी मेरी बारी संभल जाइए। गर नहीं है तुम्हें देश मेरा पसंद, देश द्रोही यहाँ से निकल जाइये ।आज़ादी के लिए हमारी लंबी चली लड़ाई थी , लाखों लोगों ने अपने प्राणों से कीमत चुकाई थी ।तिरंगा लेहराता है आज पूरी कीमत से , हमें मिली आज़ादी … Read more

Stree Man Ka Bhawar By Richa Kumari

“स्त्री मन का भवर “ क्या स्त्री की व्याख्या उसके मूल से बड़ी है?उसके मन की दुविधा कुछ इस तरह अरी है,झींझक से भरी है थोड़ी डरी डरी है।जमाने को बढ़ता देख आज वह निकल पड़ी है,कभी हौसले से पांव दहलीज को तोड़ता,तो कभी घटनाओं का शोर अंदर से और मोड़ता ।आखिर क्यों स्त्री मन … Read more