ममता की जो मूरत होती,
जिसकी गोदी सबसे प्यारी।
जिसकी लोरी सुनकर सोए,
यह दुनिया की खुशियाँ होती।
खुद भूखी रहकर जो हमको,
हँसते-हँसते अन्न खिलाती।
थोड़ी सी भी चोट लगे तो,
जिसकी आँखें भर-भर आती।
उँगली पकड़कर चलना सिखाया,
गिरा तो दोबारा उठना बताया।
सारे रिश्ते-नाते झूठे,
पर माँ का नाता सच्चा।
अँधेरे में जो राह दिखाए,
दीप बनके जलते जाए।
अपने आँचल की छाया में,
हर विपत्ति से हमें बचाए।
बिना कहे जो सब कुछ समझे,
वह तो केवल माँ होती।
सारे दुख सहकर भी हँसती,
और सुख के बीज सदा बोती है।
जब हमको बुखार होता,
माँ हमारा ध्यान रखती।
माँ के हाथों में जो जादू,
वह तो नहीं होटलों में मिलता।
हर छोटी-बड़ी गलती को बताती,
सलीके से रहना हमें सिखाती।
सब कहते तीर्थ यात्रा पर जाओ,
पर माँ के चरणों में चारों धाम हैं।
परीक्षा के समय सुबह उठाकर,
पढ़ने को माँ कहती;
प्यार से दही-चीनी खिलाती,
माँ के रूप जैसा इस संसार में कोई नहीं!
By Mohit Kumar Bind, DAV Amlohri