कल तक जो था शांत तपोवन, आज वो ऊर्जाधानी है।
ऋषि श्रृंगी की तपोभूमि का नाम श्रृंगावली प्यारा था,
रीवा के राजाओं का यह अंचल सबसे न्यारा था।
माड़ा की गुफाएँ गाती हैं यहाँ की कला-साधना को,
पत्थरों पर उकेरा गया है, पुरखों की आराधना को।
पर समय बदला और बदली सूरत,
इस पावन कल्याणी की,
जब भारत माँ ने नींव रखी, इस अद्भुत ऊर्जाधानी की।
रिहंद बांध की ठंडी लहरें जब अंगारों से मिलती हैं,
तब विन्ध्याचल के टरबाइनों में विकास की कलियाँ खिलती हैं।
एक सौ चालिस मिलियन कोयला उगलती यह धरती,
चार हजार सात सौ साठ मेगावाट से देश का कोना-कोना रोशन करती।
कोल हीरों के सीने से यहाँ भोर नया उग आता है।
सिंगरौली का श्रमिक जब जागता, देश का भाग्य बदल जाता है।
है नमन यहाँ के त्याग को, है नमन यहाँ के गौरव को,
है ऋणी हमेशा पूरा भारत इसके अतुल्य वैभव को।
शब्द नहीं इतने इस धरा के वर्णन को, जिसे संयोजित कर उतारा जा सके।
आइए हम सब मिलकर बनाएँ इस सिंगरौली महोत्सव को इतना खास,
ताकि इसे यादगार बनाया जा सके।
by Anushree Tripathi, DAV Dudhichua